राकेश दुबे@प्रतिदिन। देश की नब्ज को टटोले, तो शायद आप भी लाल कृष्ण आडवाणी की आपातकाल की आशंका से सहमत दिखें। राजनीति सब कुछ ध्वस्त करने पर आमदा है। आधा समय यूपीए और एनडीए का दूसरे की खामियां खोजने में बीतता हैं आधा मीडिया को नासमझ ठहराने में।
देश में फिलहाल ढाई गठ्बन्धन कार्यरत है यूपीए एनडीए और एक अपनी दिशा तय नहीं कर पा रहा समाजवादी जमावड़ा। वैसे यह भी कहना गलत नहीं होगा की कांग्रेसनीत गठ्बन्धन में एक परिवार का वाक्य अंतिम वाक्य है तो भाजपानीत गठबंधन में एक व्यक्ति का। दोनों गठ्बन्धन की प्रमुख पार्टियां वास्तविक अर्थों में राष्ट्रीय पार्टी कहलाने लायक बची नहीं हैं। कांग्रेस लोकतंत्र के प्रति 'आस्था' इमर्जेंसी के दौरान दिखा ही चुकी है। उससे ज्यादा तकलीफ की बात यह है कि कांग्रेस पार्टी ने देश को ढाई साल तक लोकतंत्र से वंचित रखने को लेकर आज तक खेद भी व्यक्त नहीं किया है। दूसरी तरफ भाजपा के अंदर भी हाल के दिनों में ऐसी प्रवृत्तियां मजबूत हुई हैं, जिनका लोकतांत्रिक भावनाओं और कसौटियों से कोई मेल नहीं है। सरकार में सारी शक्तियां एक व्यक्ति के इर्द गिर्द सिमटी हुई हैं। विरोधी आवाजों को चुप करा देने या शोर में डुबो देने की कोशिशें साफ नजर आ रही हैं।
लोकतंत्र का पहरेदार कहे जा सकने वाले ऐसे संस्थान देश में मौजूद हैं , जिनकी लोकतांत्रिक मूल्यों को लेकर प्रतिबद्धता संदेह से परे है । मीडिया 70 के दशक के मुकाबले आज कहीं ज्यादा आक्रामक है, लेकिन पूंजी और राजनीति के दबाव में वह कई बार आंधी में मामूली पौधे की तरह इधर-उधर होता दिखाई देता है। खासकर मीडिया कंपनियों में क्रॉस ओनरशिप को लेकर नियमों का अभाव कभी भी कोई बुरा खेल, खेल सकता है। अगर कोई एक ही कंपनी तमाम मीडिया समूहों के शेयर खरीद कर उनकी नीति निर्धारक स्थिति में पहुंच जाती है तो उस खास कंपनी के एजेंडे को ही देश के एजेंडे के रूप में पेश करने से कोई कैसे रोक सकेगा।
राजनीति और मीडिया से आगे अगर समाज की बात करें तो वहां भी इस दौरान लोकतंत्र के मुकाबले धनबल और बाहुबल कहीं ज्यादा प्रभावी मूल्य के रूप में उभरे हैं। जिसके पास ताकत है वह किसी भी उपाय से किसी का मुंह बंद कर सकता है। और तो और, सोशल मीडिया में अपनी बात कहने के लिए भी आपको जिंदा जलाया जा सकता है। यह ध्यान रखना जरूरी है कि लोकतांत्रिक मूल्यों और अधिकारों का अपहरण हर बार बाकायदा घोषित करके ही नहीं किया जा सकता। वह लोकतांत्रिक आवरण में, कायदे-कानूनों की आड़ में भी हो सकता है और उसके प्रयास जारी हैं । बचाव का कोई उपाय नहीं है, सिवाय निरंतर चौकसी, लगातार जागरूकता के। ऐसे में लालकृष्ण आडवाणी से आप असहमत नहीं हो सकते। आडवाणी देर से बोले, के एन गोविन्दाचार्य पहले से कह रहे हैं। लिखने के लिए सच के साथ खड़े अख़बार अब है नहीं, सोशल मीडिया है और, इसकी चाबी सरकार के हाथ में है।