राकेश दुबे @प्रतिदिन। आईएएस अफसर ऋजु बाफना जो हुआ वह यह साबित करता है कि एक आम महिला के साथ कैसा सुलूक होता होगा? भारत में आईएएस अफसरों की हैसियत बहुत ऊंची होती है और जिले में तो वे सबसे ज्यादा ताकतवर होते हैं लेकिन महिला होने की प्रताड़ना से अक्सर ऊंचे पदों पर बैठी महिलाएं भी नहीं बच पातीं।
यूँ तो मसले से कई पहलू जुड़े हैं। पहला यह कि न्यायपालिका की निचली पायदान और हाई कोर्ट, सुप्रीम कोर्ट के स्तर में जमीन-आसमान का फर्क है। यह कई न्यायविद भी कह चुके हैं कि न्यायपालिका में निचले स्तर पर श्रेष्ठ स्तर के वकील और कानून के जानकार नहीं मिलते। अच्छे न्यायिक संस्थानों से निकले प्रतिभाशाली लोग या तो कॉरपोरेट कानून में चले जाते हैं या फिर हाई कोर्ट, सुप्रीम कोर्ट में वकालत करने लगते हैं। निचले स्तर की अदालतों का आमतौर पर जो माहौल होता है, उसमें न्यायपालिका के बेहतर तौर-तरीकों का पालन नहीं हो पाता।
महिलाओं के लिए अदालत का माहौल ज्यादा असहनीय होता है, खासकर गरिमा की रक्षा के लिए अदालती कार्रवाई को लेकर नियम बने तो हैं। इस मामले से साफ पता चलता है कि न्यायपालिका के निचले स्तर पर इन नियमों की जानकारी और पालन मुश्किल से होता है।
हुआ यह है कि पिछले दिनों महिलाओं के खिलाफ अपराध रोकने या उन्हें न्याय दिलाने के लिए काफी सारे न्यायिक और प्रशासनिक नियम-कानून बनाए गए हैं, लेकिन व्यापक समाज और न्यायपालिका या प्रशासन के जमीनी स्तर पर जो मानसिकता है, वह इन नियम-कानूनों की प्रगतिशीलता के साथ तालमेल नहीं बिठा पाई है। वैसे हमारे देश में कानून तो बहुत प्रगतिशील हैं, लेकिन उन पर अमल करवाने की जिम्मेदारी जिन पर है, वे लोग उतनी मुस्तैदी से उनका पालन नहीं करवा पाते।
यह स्थिति तमाम सरकारी दफ्तरों की भी है, जहां आम नागरिकों के साथ सम्मानजनक व्यवहार जरूरी नहीं समझा जाता। हमारे देश में इस वक्त इतने सारे सामाजिक-सांस्कृतिक स्तर हैं, उनका असर प्रशासन में भी दिखता है।
श्री राकेश दुबे वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं।
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