अर्जुन सिंह ने अवैध नियुक्तियां की, शिवराज सिंह ने प्रमोशन

भोपाल। मप्र के कुछ बदनाम विभागों में से एक है जलसंसाधन विभाग। इस विभाग में सरकारों के बदलने का कोई असर नहीं हुआ। अर्जुन सिंह की सरकार के समय हुईं अवैध नियुक्तियों को दिग्विजय सिंह के समय स्थाई किया गया और शिवराज सिंह के समय प्रमोशन। अब बैकडोर से नौकरी पाने वालों को अवैध प्रमोशन मिलेगा तो स्वभाविक है भ्रष्टाचार ही होगा। आप सिर्फ इतना समझ लीजिए कि अकूत संपत्ति जुटाने के मामले में बर्खास्त हुए फरार आईएएस अरविंद जोशी इसी विभाग के सचिव थे। यह अकूत संपत्ति उन्होंने सिंचाई विभाग में रहते ही कमाई थी। इस गोलमाल की शिकायत अर्जुन सिंह से लेकर शिवराज सिंह तक सभी मुख्यमंत्रियों को बार बार की गई परंतु किसी भी मुख्यमंत्री ने कोई जांच नहीं कराई। 

रिकार्ड बताते हैं कि 1975 में अकेले जलसंसाधन विभाग में 236 इंजीनियरों को सिर्फ छह महीने के​ लिए संविदा नियुक्ति पर रखा गया था। मगर पीएससी की परीक्षा पास किए बिना, उन्हें लगातार न सिर्फ पद पर बनाए रखा गया बल्कि वे नियमित भी हुए और छह प्रमोशन भी मिले। सरकारें किसी की भी रही हों इनका बाल बांका नहीं हुआ।

अर्जुनसिंह की सरकार में बाबू हनुमंत सिंह और दिग्विजय सिंह विभाग के मंत्री थे। जब दिग्विजय सिंह मुख्यमंत्री बने तो सुभाष यादव सिंचाई मंत्री रहे। इसके बाद भाजपा सरकारों में अनूप मिश्रा और बीते सात साल से जयंत मलैया मंत्री हैं। इन्होंने भी विभाग में नियुक्ति और प्रमोशन के इस गोरखधंधे को चलने दिया। जबकि पीएससी के जरिए आए इंजीनियर सालों तक इन सबको हकीकत बताते रहे।

वर्ष 2000 तक प्रमुख अभियंता के पास ही विभाग के सचिव का भी दायित्व होता था। इसके बाद विभाग में सचिव के साथ प्रमुख सचिव भी नियुक्त किए गए। इनमें एलके जोशी, आरएस सिरोही, रणवीर सिंह, सुब्रतो बनर्जी, आनंद अस्थाना के बाद 2005 में अरविंद जोशी प्रमुख सचिव बने जो 2010 तक इस पद पर रहे। इसके बाद से आरएस जुलानिया इस पद पर बने हुए हैं।

पांच सालों से जमे हैं प्रभारी
अभी हाल यह है कि पिछले पांच सालों से प्रथम श्रेणी के पदों के लिए डीपीसी तक नहीं हुई। प्रमुख सचिव राधेश्याम जुलानिया ने भी इस तरफ ध्यान नहीं दिया। इससे ईई, चीफ इंजीनियर और ईएनसी जैसे महत्वपूर्ण पदो पर प्रभारियों से ही काम चलता रहा है। जबकि ईएनसी के पद के लिए योग्य उम्मीदवार उपलब्ध हैं। इसके बावजूद एमजी को चौबे एनबीडीए में और जेएन शिवहरे प्रभारी मेंबर इंजीनियरिंग के पद पर जमे हुए।

जयंत मलैया/आरएस जुलानिया: 21 अधिकारियों को अवैध प्रमोशन
2008 में जयंत मलैया मंत्री बने। तब प्रमुख सचिव हुए आरएस जुलानिया, जो अब तक इस पद पर हैं। इनके समय 2010 में 38 में से पहले 16 और बाद में 5 इंजीनियरों को चीफ इंजीनियर का पद दिया गया।

2 जनवरी 2012 को फिर एक बड़ा फैसला हुआ। इन इंजीनियरों में से ओमप्रकाश श्रीवास्तव को नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण और एमजी चौबे को ईएनसी के पद पर प्रमोशन दे दिया। यह पहला मौका था जब बगैर पीएससी से चयनित किसी इंजीनियर को प्रमुख अभियंता (ईएनसी) बनाया गया। इससे पहले विभाग में ईएनसी रहे एपी खरे, आरडी इकतारे, एके सोजतिया, केएन अग्रवाल और पीके तिवारी, केसी प्रजापति पीएससी से चयनित थे। जुलानिया ने 2010 में नियमित ईएनसी प्रजापति को हटाकर उस समय के चीफ इंजीनियर एमजी चौबे को ईएनसी का प्रभार सौंप दिया। चौबे तब से ही इस पद पर काबिज हैं।

अनूप मिश्रा (तत्कालीन मंत्री): 38 इंजीनियरों को ईई से एसई बनाया
वर्ष 2005 में भाजपा सरकार में अनूप मिश्रा विभाग के मंत्री हुए। उनके कार्यकाल में वर्ष 2007 में 236 में से 38 इंजीनियरों को डीपीसी कर ईई से एसई बनाया गया था।

सुभाष यादव (तत्कालीन मंत्री): जेई बन गए एक्जीक्यूटिव इंजीनियर
कांग्रेस सरकार में 10 साल तक सुभाष यादव सिंचाई मंत्री रहे। उनके कार्यकाल में एडहॉक पर लिए गए जूनियर इंजीनियर तीन डीपीसी के जरिए 1997, 1998 व 2003 में प्रमोशन पाते हुए इई के पद तक जा पहुंचे।

आईएएस अरविंद जोशी: 150 से ज्यादा इंजीनियरों को ऊंचे पद दिए
अरविंद जोशी के 2005 से 2010 के कार्यकाल में जोशी ने डेढ़ सौ से ज्यादा इंजीनियरों को ऊंचे पदों के प्रभार सौंपे। विभाग में यह दौर मनमाने कामकाज के लिए याद किया जाता है। अनुपातहीन संपत्ति के मामले में जोशी के यहां जब आयकर विभाग की सबसे चर्चित कार्रवाई हुई तब वे इसी विभाग में प्रमुख सचिव थे। यह उनकी प्रशासनिक पारी का आखिरी ओवर था। उन्होंने यमुना कछार में एसई रहे एचडी जोशी को आठ संभागों के चीफ इंजीनियरों का प्रभार दिया। इनमें सागर, इंदौर, दतिया, भोपाल, सिवनी के प्रभार थे। ये वही एचडी जोशी हैं, जिन्होंने ग्वालियर और दतिया में करोड़ों रुपए के यूम पाइप खरीदे थे। यह एक बड़ा घोटाला था, जिसकी जांच के बाद कई इंजीनियर बर्खास्त तक हुए।

कांग्रेस हो या भाजपा, सबके राज में बंटेे मनमाने प्रमोशन मंत्री हो या प्रमुख सचिव, सबकी रही मौन सहमति नियम यह है संविदा आधार पर काम पर रखे गए इन इंजीनियरों को नियमित होने के पहले मप्र लोकसेवा अयोग की परीक्षा पास करनी थी। मगर बिना परीक्षा पास किए इन्हें नियमित किया गया। प्रमोशन मिले। कई तो रिटायर भी हो गए।

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