
2009 में मॉडर्न डेंटल कॉलेज व अन्य की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने समय-समय पर यह अंतरिम व्यवस्थाएं दी थी कि 50 प्रतिशत सीटें डीमेट से भरी जाएं।15% एनआरआई की सीटों पर भी निजी मेडिकल कॉलेजों का हक होगा। इस व्यवस्था को कोर्ट ने बदल दिया है। नई व्यवस्था के तहत निजी कॉलेजों की सभी सीटों पर दाखिले राज्य सरकार के नियमों के तहत होंगे। इनमें 85 फीसदी सीटें स्टेट कोटे की रहेंगी जिनपर नीट यूजी की स्टेट मेरिट लिस्ट से दाखिले होंगे। इसी तरह एनआरआई कोटे की सीटों पर भी काउंसलिंग सरकारी नियमों से होगी। उल्लेखनीय है 2009 में हाईकोर्ट ने सरकार द्वारा पारित एएफआरसी एक्ट 2007 और प्रवेश व फीस संबंधी नियमों को सही ठहराया था। इस फैसले के बाद निजी मेडिकल डेंटल कॉलेजों एसोसिएशन ने इस सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी।
संचालक चिकित्सा शिक्षा डाॅ. जीएस पटेल ने बताया कि प्रदेश में 6 निजी मेडिकल और 13 डेंटल कॉलेज हैं, इनमें 900 एमबीबीएस अौर 1300 बीडीएस की सीटें हैं। वर्ष 2009 में निजी कॉलेजों में एडमिशन के लिए विद्यार्थियों से डोनेशन वसूले जाने की शिकायतें मिली थी। इस पर राज्य सरकार ने डीमेट यूजी बंद कर दी थी। साथ ही कॉलेजों में एडमिशन एमपी पीएमटी से किए जाने की व्यवस्था दी थी। सरकार के इस फैसले को एपीडीएमसी ने पहले हाईकोर्ट और बाद में सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। तभी से सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर निजी कॉलेजों की एनआरआई कोटे की सीटों को छोड़कर शेष बची सीटों में से आधे पर एडमिशन डीमेट से हो रहे थे। जबकि 42.5 फीसदी सीटें एमपीपीएमटी (वर्ष 2013) से हुए थे। व्यापमं पीएमटी 2013 में गड़बड़ी सामने आने के बाद इस प्रवेश परीक्षा को बंद कर दिया गया था। तब से अब तक स्टेट कोटे की इन सीटों पर एडमिशन एआईपीएमटी से हो रहे थे। लेकिन, अब सभी सीटें नीट यूजी 2016 से भरी जाएंगी।
निजी कॉलेजों ने दिए नियम विरुद्ध प्रवेश
सुप्रीम कोर्ट ने फैसले में निजी कालेजों की अनियमितता का हवाला देते हुए कहा है कि निजी कॉलेजों ने मेडिकल एजुकेशन को कमाई का जरिया बना लिया था। मोटी केपिटेशन को लेकर अकेले 2013 में ही प्रदेश में 300 से ज्यादा सीटें बेची गई। इसके लिए कॉलेजों पर एएफआरसी ने 13 करोड़ रुपए का जुर्माना भी लगाया था।
सकते में कॉलेज संचालक
2016-17 के लिए एडवांस बुकिंग कर अभिभावकों से लाखों रुपए डोनेशन लेने वाले कालेज संचालकों के सामने अब एडवांस राशि वापस करना बड़ी चुनौती बन गई है। इस फैसले से संचालकों पर पैसा वापसी का दबाव और बढ़ गया है।
15 से 25 फीसदी सीटें दे सकती हैं सरकार
वर्तमान में जो फीस स्ट्रक्चर है उसमें कालेज का संचालन मुश्किल है। इसे देखते हुए राज्य सरकार कुछ सीटें मैनेजमेंट कोटे के तहत कॉलेजों को दे सकती है। अन्य राज्यों में भी 15 से 25 फीसदी तक सीटें संचालकों को दी गई हैं।
पीजी सीटों जरूरी होगा आरक्षण
फिलहाल पीजी मेडिकल सीटों के आवंटन की प्रक्रिया जारी है। ताजा फैसले से पीजी मेडिकल सीटों पर भी आरक्षण नियम लागू करने होंगे। इसके चलते सीट आवंटन नए सिरे से करना होगा। हालांकि डीएमई ने इस मामले पर फिलहाल चुप्पी साध रखी है।
जो पैसा देकर डॉक्टर बनेगा, वह पैसा ही बनाएगा
जो पैसा देकर डॉक्टर बनेगा। वह पैसा ही बनाएगा। सेवा नहीं करेगा। कॉलेज संचालकों को केपिटेशन फीस लेकर सीटें भरने की अनुमति नहीं दी जा सकती। कॉलेज अपने फीस स्ट्रक्चर तय कर सकते हैं। बशर्ते वह मुनाफाखोरी का साधन न बने। वह किसी भी हालात में स्टूडेंट्स से सीधे अथवा दूसरे तरीके से केपिटेशन फीस नहीं ले सकते। राज्य सरकार को निजी कॉलेजों की फीस तय करने के लिए कानून बनाने के अधिकार हैं।