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यह 1857 के प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम से पहले की बात है। उस समय इस इलाके में जंगल हुआ करता था। यहां से गुर्रा नदी होकर गुजरती थी। इस जंगल में डुमरी रियासत के बाबू बंधू सिंह रहा करते थे। नदी के तट पर तरकुल (ताड़) के पेड़ के नीचे पिंडियां स्थापित कर वह देवी की उपासना किया करते थे। तरकुलहा देवी बाबू बंधू सिंह कि इष्टदेवी कही जाती हैं।
घने जंगलों में विराजमान सुप्रसिद्ध मां तरकुलहा देवी मंदिर आज तीर्थ के रूप में विकसित हो चुका है। हर साल लाखों श्रद्धालु मां का आशीर्वाद पाने के लिए आते हैं। मां भगवती का यह मंदिर कभी स्वतंत्रता संग्राम का भी एक प्रमुख हिस्सा रहा है।
आजादी से पहले हर भारतीय का खून अंग्रेजों के जुल्म की कहानियां सुनकर खौल उठता था। इस समय देश में कई क्रांतिकारी हुए, जिन्होंने अपने-अपने तरीके से देश को अंग्रेजों के चंगुल से छुड़ाने की हर संभव कोशिश की। इन्हीं क्रांतिकारियों में से एक थे बंधू सिंह। बचपन से अंग्रेजी हुकूमत के जुल्मों की कहानियां सुनकर बड़े हुए बंधू सिंह के दिल में भी अंग्रेजों के खिलाफ आग जलने लगी।
बंधू सिंह गुरिल्ला लड़ाई में माहिर थे, इसलिए जब भी कोई अंग्रेज उस जंगल से गुजरता, बंधू सिंह उसको मार कर उसके सर को काटकर देवी मां के चरणों में चढ़ा देते थे। पहले तो अंग्रेज यही समझते रहे कि उनके सिपाही जंगल में जाकर लापता हो जा रहे हैं, लेकिन धीरे-धीरे उन्हें भी पता लग गया कि अंग्रेज सिपाही बंधू सिंह के शिकार हो रहे हैं।