
खुद रेलवे अफसर और परिवहन विशेषज्ञ भी इस फैसले पर अचरज जता रहे हैं। उनका कहना है कि यह स्कीम त्योहारों व गर्मियों में लंबी दूरी की प्रीमियम ट्रेनों में आरक्षण की बढ़ती मांग का फायदा उठाने के इरादे से लाई गई है लेकिन इससे नुकसान भी संभव है क्योंकि रेल यात्रियों का यह तबका विमानों का रुख भी कर सकता है।
अभी दिल्ली-मुंबई राजधानी का सेकेंड एसी का आधार किराया 2369 रुपए है। इसमें आरक्षण शुल्क (50 रुपए), सुपरफास्ट चार्ज (45 रुपए), सर्विस टैक्स (111 रुपए) तथा खानपान शुल्क (295 रुपए) को जोड़ने पर कुल किराया 2870 रुपए बनता है।
शुक्रवार से जब फ्लेक्सी फेयर स्कीम लागू होगी तो शुरू की 10 फीसद बर्थ को छोड़कर आगे की हर 10 फीसद बर्थ का आधार किराया बढ़कर क्रमशः 2606, 2843, 3080, 3317 और 3554 रुपए हो जाएगा। इसमें आरक्षण शुल्क, सुपरफास्ट शुल्क और कैटरिंग शुल्क तो ऊपर दी गई निश्चित दरों के हिसाब से ही लगेगा।
परंतु सर्विस टैक्स लगने से आधार किराये के अनुसार बढ़ेगा और क्रमशः 122, 132, 143, 154 तथा 164 रुपए हो जाएगा। इसके परिणामस्वरूप शुरू की दस फीसद बर्थ के बाद अगली हर दस फीसद बर्थ का कुल किराया क्रमशः 3118, 3365, 3613 और अंततः 4108 रुपए हो जाएगा।
जानकारों के अनुसार इस किराये पर व्यस्त मौसम को छोड़ बाकी दिनों में हवाई जहाज के टिकट भी मिल जाते हैं। ऐसे में ट्रेन में प्रतीक्षा सूची का टिकट लेने के बजाय लोग हवाई सफर को तवज्जो देंगे। इस तरह फ्लेक्सी फेयर में शुरू की 40 फीसद बुकिंग पर ही सारा दारोमदार रहने की संभावना है।
वजह यह है कि इस स्तर तक अधिकतम बढ़ोतरी 26 फीसद ही है। जबकि इसके बाद की सीटों के लिए 35 और 43 फीसद अधिक राशि अदा करनी पड़ेगी।
जहां तक थर्ड एसी की बात है तो इस श्रेणी के किराये भी 32 फीसद तक बढ़ गए हैं लेकिन इसके बावजूद इन यात्रियों के भागने की ज्यादा संभावना नहीं है। इसका कारण यह है कि दिल्ली से मुंबई के बीच राजधानी से सफर के लिए इन्हें अब भी ज्यादा से ज्यादा 2765 रुपए ही देने पड़ेंगे। इस दर पर हवाई जहाज का टिकट मिलने की संभावना बहुत कम है।
वैसे राजधानी, दुरंतो और शताब्दी में फ्लेक्सी फेयर लागू किए जाने से रेलवे बोर्ड के अनेक अफसर भी हैरत में हैं। एक अधिकारी ने कहा इसमें आर्थिक लाभ कम और राजनीतिक नुकसान ज्यादा है। डेढ़ गुना सुनते ही खराब लगता है। यदि राजस्व जुटाना ही मकसद था तो सभी ट्रेनों और श्रेणियों में 10 फीसद की एकमुश्त बढ़ोतरी बेहतर रहती। बदनामी तो तब भी होती लेकिन कम से कम अधिक राजस्व मिलने का संतोष तो होता।