
केंद्रीय मंत्रिमंडल ने ऐसे समय में इस विधेयक को मंजूरी दी है, जब राष्ट्रीय एड्स कार्यक्रम वित्तीय संकट के कारण दम तोड़ रहा है। इसके बजट में भी कटौती की गई थी। मरीज दवाइयों की कमी के संकट से जूझ रहे हैं। कहा जा सकता है कि सरकार ने सही समय पर सही कदम उठाया है। विधेयक में एचआईवी-एड्स से पीड़ित मरीजों के साथ भेदभाव करने पर तीन माह से लेकर दो साल तक की सजा का प्रावधान है। सबसे महत्त्वपूर्ण प्रावधान है कि रोजगार पाने और शैक्षणिक संस्थानों में मरीज को बीमारी के बारे में बताना अनिवार्य नहीं होगा। यह प्रावधान मरीज को आत्मनिर्भर बनाने और आत्मसम्मान दिलाने में मददगार साबित हो सकता है।
दरअसल, हमारा समाज एचआईवी-एड्स से पीड़ित मरीजों को दकियानूसी नजरिये से देखता है। उसके नजरिये में जब तक कोई क्रांतिकारी परिवर्तन नहीं होता है, तब तक इस तरह के अच्छे से अच्छे कानून कागजों में ही दम तोड़ देते हैं। फिर भी ऐसे सामाजिक समूह, सामाजिक संगठन और नागरिक समाज जो इस रोग से पीड़ित मरीजों के बीच जाकर उनकी सेवा करते हैं। उनके लिए यह कानून बहुत बड़े संबल का काम करेगा। वैसे भी सामाजिक चेतना का धीरे-धीरे ही विस्तार होता है। एचआईवी-एड्स भयावह बीमारी है, लेकिन लाइलाज नहीं. कहा जाता है कि इलाज से बेहतर बचाव और रोकथाम है। इसकी रोकथाम के लिए चलाया गया जागरूकता अभियान पूरी तरह सफल नहीं हो पाया है। इसलिए एचआईवी-एड्स जैसी घातक महामारी के लिए निरंतर जागरूकता अभियान चलाने की आवश्यकता है। सरकार को कानून बनाने के साथ-साथ एचआईवी-एड्स से संबंधित नीति भी स्पष्ट करनी होगी। ऐसा करके ही इस जानलेवा महामारी से समाज को बचाया जा सकेगा।
श्री राकेश दुबे वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं।
संपर्क 9425022703
rakeshdubeyrsa@gmail.com
पूर्व में प्रकाशित लेख पढ़ने के लिए यहां क्लिक कीजिए