
दरअसल नौ फरवरी को जेएनयू परिसर में हुई देश विरोधी नारेबाजी के बाद लेफ्ट पर तोहमत लगी थी। उसके नेताओं को राष्ट्रद्रोही बताया गया, लेकिन छात्रसंघ चुनावों में जेएनयू के करीब आठ हजार वोटरों में से अधिकतर ने लेफ्ट नेताओं को ही चुना जिससे एबीवीपी के लिए कैंपस में चुनौती पैदा हो गई। केंद्र में सरकार भाजपा की है, ऐसे में भी एबीवीपी की कैंपस में चल नहीं रही है, यह टीस भगवा ब्रिगेड में है। दूसरी ओर लेफ्ट विंग को दर्द यह है कि वर्षों से उनके कब्जे वाले इस कैंपस में भगवा ब्रिगेड का दखल और वर्चस्व क्यों बढ़ रहा है।
कन्हैया कुमार ने भी माना था कि कैंपस में एबीवीपी कमजोर नहीं है। इसलिए चुनाव में लेफ्ट के सारे संगठन एकजुट हो गए। ऑल इंडिया स्टूडेंट्स फेडरेशन (एआईएसएफ) ने फाइट नहीं किया। ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (आइसा) और स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया (एसएफआई) ने गठबंधन कर लिया। नतीजा ये हुआ कि एबीवीपी को एक भी सीट नहीं मिली। संयुक्त सचिव की उसकी सीट भी लेफ्ट ने छीन ली, जबकि उसका वोट प्रतिशत बढ़ा है।
जेएनयू छात्र संघ चुनाव 9 सितंबर को खत्म हो गया। उसके बाद अब बारी आई है अलग-अलग हॉस्टल यूनियन के चुनावों की। इसमें भी ताकत दिखाई जाती है। इसमें ज्यादातर हॉस्टलों पर वामपंथी संगठनों से जुड़े लोगों का कब्जा है। यहां पर 17 हॉस्टल हैं, जिनका अलग-अलग चुनाव होता है। नजीब मावी-मांडवी हॉस्टल में रहता था। वो एबीवीपी के छात्र नेता विक्रांत यादव से कहासुनी और हाथापाई के बाद ही गायब हुआ है। इस हॉस्टल के प्रधान अलीमुद्दीन हैं। नए प्रधान का चुनाव 17 अक्टूबर को होना था। लेकिन 14 तारीख की रात हुए झगड़े के बाद इसे टाल दिया गया है।
जेएनयू के छात्र नेता रामा नागा का आरोप है कि रमजान के दौरान कैंपस में कुछ पर्चे लगाए गए थे। उसे राइट विंग (एबीवीपी) कार्यकर्ताओं ने फाड़ दिया। दूसरी ओर एबीवीपी नेता सौरभ शर्मा कहते हैं कि कैंपस में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पुतले को रावण बनाकर उसका दहन किया गया, जो बहुत ही गलत है। नजीब एबीवीपी के छात्र नेता से कहासुनी और हाथापाई के बाद ही गायब हुआ है इसलिए लेफ्ट इसे लेकर एबीवीपी पर आरोप लगा रहा है। मतलब दोनों पक्षों में संघर्ष बढ़ रहा है। कैंपस का माहौल इतना तनावपूर्ण कभी नहीं था।