
‘कल्चर्स ऑफ प्रोटेस्ट’ सेमिनार में जिस उमर खालिद और शहला रशीद को बुलाया गया था, उन पर पिछले साल ही देश के खिलाफ नारेबाजी का गंभीर आरोप है। स्वाभाविक है कोई भी शख्स या संगठन ऐसे तत्वों को नहीं सुनना चाहेंगे। इनका विरोध राष्ट्रवाद के स्वर को मुखर करता है। मगर विरोध जब हिंसात्मक हो जाए तो असली मुद्दे पीछे छूट जाते हैं।
डीयू प्रकरण में दरअसल ऐसा ही कुछ देखने को मिला है। भारी विरोध के बावजूद संवाद होते रहने चाहिए। बोलने की ताकत से ज्यादा सुनने का साहस बड़ी बात है। मगर अफसोस ऐसे दृश्य इन दिनों शिक्षण केंद्रों से गायब हैं। ठीक है, पार्टी की विचारधारा या उसके एजेंडे का प्रचार-प्रसार हर सियासी जमात चाहता है, परंतु इसके लिए हिंसक होना या देश विरोधी आंच पर रोटियां सेंकना कहीं से भी उचित नहीं कहा जा सकता। जेएनयू प्रकरण से जो सबक मिले शायद उसे भी याद नहीं रखा गया।
इसमें दोष डीयू प्रशासन का भी है। जिसने पहले सेमिनार की इजाजत दी। विश्वविद्यालय को संवाद का मंच बनाया जाए किंतु ओछी राजनीति का अखाड़ा न बनने दिया जाए। पहले जेएनयू, फिर बेंगलुरु और अब डीयू. क्या शिक्षा के अहम केंद्र विरोध, हिंसा और अभिव्यक्ति की आजादी की आड़ में देश के खिलाफ सोचने और बोलने वालों के केंद्रबिंदु के तौर पर जाने जाएंगे?
इससे भरसक बचने की कोशिश होनी चाहिए। आदर्श स्थिति तो यही बनती है कि विश्वविद्यालय परिसर में किसी भी गलत शख्स या सियासतदां को बुलाने पर रोक लगनी चाहिए। सहमति और असहमति तक बात हो तो क्षम्य है, लेकिन जिससे शिक्षा के अहम संस्थान चोटिल हों उसे दुरुस्त करने की जिम्मेदारी हर किसी की है? सरकार और उनकी मशीनरी की तो सबसे ज्यादा।
श्री राकेश दुबे वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं।
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