
रिजर्व बैंक ने बैंकों से कहा था कि सबसे बड़े 12 डिफॉल्टरों को दिवालिया घोषित कराने की प्रक्रिया शुरू की जाए। इसके बाद भी बैंकिंग सेक्टर यह उम्मीद पाले बैठा था कि रिजर्व बैंक दिवालियापन की प्रक्रिया में थोड़ा लचीलापन लाएगा, जिससे बैंकों को आगे बढ़ने में आसानी हो। मगर रिजर्व बैंक ने इस प्रक्रिया को बैंकों के लिए और मुश्किल बना दिया है। इन 12 बड़े डिफॉल्टरों का बकाया करीब ढाई लाख करोड़ रुपये बताया जाता है, जो कुल बैड लोन का एक चौथाई है। माना जा रहा है कि अगर रिजर्व बैंक के ताजा निर्देशों को सही ढंग से लागू किया गया तो बैंकों को मौजूदा वित्तीय वर्ष के अंत तक करीब 50 हजार करोड़ रुपये की रकम नुकसान के मद में दिखानी पड़ सकती है।
बैंकों की बैलेंसशीट में बढ़ते घाटे का असर शेयर बाजार पर दिखेगा में उनका क्या हाल होगा, समझ से परे है। रिजर्व बैंक का उद्देश्य बैंकिंग सेक्टर को कठिनाई में डालना नहीं, उसे अनुशासित करना है। शायद इसी कारण उसने बैंकों को अपने इन निर्देशों पर अमल के लिए तीन तिमाहियों की लंबी अवधि दे रखी है। इन फंसे हुए कर्जों को अपने खातों में घाटे के रूप में दर्ज कराते हुए बैंकों के पास यह रकम तीन तिमाहियों में समायोजित करने का विकल्प होगा, जिससे यह डर नहीं रहेगा कि ये खराब लोन किसी एक तिमाही में ही बैलेंसशीट का कचूमर न निकाल दें।
कुल मिलाकर देखा जाए तो पहली बार भारतीय रिजर्व बैंक ने बैड लोन की समस्या को पूरी सख्ती से संबोधित करने की कोशिश की है। हमारे बैंकों को भारतीय रिजर्व बैंक इस कदम के मर्म को समझना चाहिए और बड़ी कंपनियों को खुले हाथों लोन बांटने की अपनी आदत में सुधार करना चाहिए । जिससे आम लोगों की मेहनत का पैसा ऐसे या वैसे माल्या को विजय करने, और सहारा को और बड़ा सहारा देने की प्रवृत्ति पर अंकुश लगे तथा आम आदमी का बैंको के प्रति बदलते नजरिये में सुधार आये।
श्री राकेश दुबे वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं।
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