
नाग की महिमा
‘शेषनाग अपने फन पर पृथ्वी को धारण करते हैं। वे पाताल में रहते हैं। उनके सहस्र फन हैं। प्रत्येक फन पर एक हीरा है। उनकी उत्पत्ति श्रीविष्णु के तमोगुण से हुई। श्रीविष्णु प्रत्येक कल्प के अंत में महासागर में शेषासन पर शयन करते हैं। त्रेता एवं द्वापर युगों के संधिकाल में श्रीविष्णु ने राम-अवतार धारण किया। तब शेष ने लक्ष्मण का अवतार लिया। द्वापर एवं कलि युग के संधिकाल में श्रीविष्णु ने कृष्णावतार धारण किया तब शेष बलराम बने। नागों में श्रेष्ठ ‘अनंत’ मैं ही हूं’, इस प्रकार श्रीकृष्ण ने गीता (अध्याय 10, श्लोक 29) में अपनी विभूति का कथन किया है।
पूजन
नागपंचमी के दिन हलदी से अथवा रक्तचंदन से एक पीढे पर नवनागों की आकृतियां बनाते हैं एवं उनकी पूजा कर दूध एवं खीलों का नैवेद्य चढाते हैं। नवनाग पवित्रकों के नौ प्रमुख समूह हैं। पवित्रक अर्थात अत्यंत सूक्ष्म दैवी कण (चैतन्यक)। विश्व के सर्व जीवजंतु विश्व के कार्य हेतु पूरक हैं। नागपंचमी पर नागों की पूजा द्वारा यह विशाल दृष्टिकोण सीखना होता है कि ‘भगवान उनके द्वारा कार्य कर रहे हैं। नागपंचमी के दिन कुछ न काटें, न तलें, चूल्हे पर तवा न रखें इत्यादि संकेतों का पालन बताया गया है। इस दिन भूमिखनन न करें।
सर्पभय नष्ट होने के लिए आराधना !
‘अनन्तं वासुकिं शेषं पद्मनाभं च कम्बलम्।
शंखपालं धृतराष्ट्रं तक्षकं, कालियं तथा॥’
अर्थात अनंत, वासुकी, शेष, पद्मनाभ, कंबल, शंखपाल, धृतराष्ट्र, तक्षक एवं कालिया, इन नौ जातियों के नागों की आराधना की जाती हैं। इससे सर्पभय नहीं रहता और विषबाधा नहीं होती ।’ श्री आनंद जाखोटिया, समन्वयक, हिन्दू जनजागृति समिति, मध्यप्रदेश (7021912805)
(संदर्भ : सनातन संस्था का ग्रंथ ‘त्योहार मनानेकी उचित पद्धतियां एवं अध्यात्मशास्त्र’)