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देश में पिछले कुछ दिनों में सेना से जुड़े कुछ मुद्दे राजनीतिक विमर्श का विषय बने। वन रैंक, वन पेंशन, दो वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों की वरीयता की अनदेखी करके जनरल बिपिन रावत को सेना प्रमुख बनाया जाना। इन मुद्दों पर सरकार के फैसले को लेकर विपक्षी दलों ने सवाल खड़े किए और इन्हें सार्वजनिक विमर्श का विषय बना दिया। समान्य चर्चा में भी ये मुद्दे छाए रहे।सेना की सर्जिकल स्ट्राइक पर भी सरकार और विपक्ष का रुख अलग-अलग रहा है। जो नहीं होना चाहिए था। इसका राजनीतिक फायदा उठाने में पड़ोसी और प्रतिद्वंद्वी पाकिस्तान भी पीछे नहीं रहा। ऐसा लगता है सेना प्रमुख का इशारा इसी ओर है, जरूरत उनके इशारे को समझने की है| इतिहास गवाह है कि औपनिवेशिक सत्ता से आजाद हुए एशिया-अफ्रीका के जिन-जिन देशों में सेना का राजनीतिकरण हुआ वहां लोकतंत्र सफल नहीं हुआ।
हकीकत में सेना का राजनीतिकरण और लोकतंत्रीकरण दोनों अलग-अलग मुद्दे हैं। अब यह बहस का मुद्दा हो सकता है कि सेना प्रमुख जिसे राजनीतिकरण बता रहे हैं, उसका मतलब सेना में लोकतंत्रीकरण से तो नहीं है? यह सवाल इसलिए भी उठता है क्योंकि उन्होंने यह भी कहा है कि एक वक्त था, जब सेना के भीतर आम बातचीत में महिला और राजनीति के लिए कोई जगह नहीं थी। ये दोनों विषय धीरे-धीरे विमर्श में ही सही अपनी जगह पर आ कर रहे हैं। मुद्दा यह है कि अगर सेना प्रमुख का यह विश्वास है कि सैन्य बलों का राजनीतिकरण हो रहा है, तो इस प्रवृत्ति पर तत्काल प्रभाव से रोक लगनी चाहिए। इसमें सत्ता पक्ष की जिम्मेदारी ज्यादा है तो विपक्ष की भी कम नहीं है। दोनों को मिल कर इसे रोकना होगा। देश हिता में यह जरूरी भी है।
श्री राकेश दुबे वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं।