
सिंगरोली
सिंगरोली की यदि बात करें तो यहां पर पिछड़ेपन की बड़ी वजह औद्योगिक विकास न होना है। साथ ही इस जिले में बारिश की बूंदें भी कम बरसती है इसलिए इसका असर इलाके की खेती पर भी देखा जाता है और यहां पर पैदावार कम होता है। इलाके में बड़ी संख्या आदिवासियों की है। सिंगरोली आजादी के बाद से ही विकास की बाट जोह रहा है। लिहाजा शिक्षा और स्वास्थ्य के हालत भी बदतर है।
बड़वानी
बड़वानी इलाका भी आदिवासी बाहुल्य है। विकास के लिए कई योजनाएं बनती है, लेकिन हकीकत में बदलने से पहले ही दम तोड़ देती है। स्वास्थ्य सेवाएं बदतर हालत में है,सड़कों की हालत खराब है और रोजगार के साधनों का अभाव होने की वजह से लोगों को पलायन करना पड़ता है। यहां से ज्यादातर लोग रोजगार की तलाश में गुजरात की रुख करते हैं। आजादी के 71 साल बाद भी क्षेत्र में रेल नहीं पहुंची है। पिछली बार हुए एक सर्वे में बड़वानी मूलभूत सुविधाओं के पैमाने पर 35 वें स्थान पर था और इंफ्रास्ट्रक्चर के पैमाने पर 89वीं रैंक मिली थी।
गुना
गुना को राजनीतिक रसूख वाला क्षेत्र माना जाता है, लेकिन इसके बावजूद विकास के पैमाने पर यह काफी पिछड़ा हुआ है। क्षेत्र के पिछड़ने की मुख्य वजह यहां पर रोजगार का अभाव माना जा रहा है। बड़े उद्योग धंधों की दरकार यहां पर लंबे समय से बनी हुई है।
विदिशा
विदिशा प्रदेश की राजधानी से लगा हुआ है और देश की विदेशमंत्री सुषमा स्वराज इसका नेतृत्व करती है, लेकिन इसके बावजूद विकास के पैमाने पर यह इलाका काफी पिछड़ा हुआ माना गया है। क्षेत्र में शिक्षा और स्वास्थ्य के हालत बेहद खराब हैं, हालांकि विदिशा को जल्द ही मेडिकल कॉलेज की सौगात मिलने वाली है। जिले की एक बड़ी समस्या कुपोषण की है। यहां पर बड़ी संख्या में महिलाएं और बच्चें कुपोषित पाए गए हैं।
खंडवा
खंडवा को नर्मदा की नजदीकी का वरदान मिला है, लेकिन नर्मदा पर बने बड़े बांधों की वजह से देश में दूसरी जगहों में काफी खुशहाली बरसी है और खंडवा के हिस्से विस्थापन की तबाही आई है। विस्थापन के दर्द से खंडवा अभी तक उबर नहीं पाया है। इस वजह से यहां पर स्वास्थ्य सेवाओं से लेकर शिक्षा तक के हालत बदतर है। औद्योगिकरण का अभाव है।
दमोह
दमोह की अगर बात करें तो क्षेत्र में सबसे बड़ी समस्या रोजगार की है। इस वजह से इलाके को पिछड़ा माना जाता है और रोजगार के अभाव में क्षेत्र में अपराधों का ग्राफ भी अक्सर ऊंचा रहता है। क्षेत्र के ग्रामीण इलाकों में हालत ज्यादा खराब है, जहां या तो स्वास्थ्य सेवाएं है नहीं, या है तो वहां पर सुविधाओं का पूरी तरह से अभाव है। कुछ इसी तरह के हालत शिक्षा को लेकर ग्रामीण इलाकों में नजर आते हैं।
छतरपुर
छतरपुर जिले में बुदेलखंड के पिछड़ने की तस्वीर देखी जा सकती है। लगातार सूखे ने इलाके की कमर तोड़कर रख दी है। योजनाएं तो कई बनती है, लेकिन अरबों की योजनाओं का या तो तरीके से अमल नहीं किया जाता या योजनाएं कागजों पर बनकर रह जाती है। इस वजह से शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं पर काफी बुरा असर हुआ है और लोग यहां से बड़ी संख्या में पलायन को मजबूर हैं।