
देश के कानून एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री रवि शंकर प्रसाद इस मुद्दे पर ट्विटर पर काफी मुखर रहे हैं। सितंबर २०१७ में एक ट्विटर उपभोक्ता ने इन मंत्री महोदय का ध्यान आकृष्ट करते हुए कहा था, 'श्रीमान, वोडाफोन हमें सिम को आधार से जोडऩे के लिए बाध्य कर रही है। आप उसे यह बताइए कि ऐसा करना अनिवार्य नहीं है।' उस ट्वीट का जवाब देते हुए प्रसाद ने १० सितंबर, २०१७ को कहा था, 'हां, सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश के अनुरूप आपको अपना मोबाइल नंबर आधार से जोडऩा जरूरी है।'
असल में, आधार को अनिवार्य बनाने की इस सरकार की मंशा के बारे में यह कोई अकेला बहाना नहीं है। लंबे समय तक यह सरकार कहती रही कि आधार के जरिये पहचान सुनिश्चित करने में चूक की आशंका 'नगण्य' है जबकि यूआईडीएआई के सीईओ ने सर्वोच्च न्यायालय को बताया था कि आधार के जरिये बॉयोमेट्रिक पहचान की १२ प्रतिशत कोशिश नाकाम रहती है। आधार को कई तरह की सेवाओं के लिए अनिवार्य बनाने की सरकारी कोशिशों का सिलसिला काफी लंबा है।
वैकल्पिक आधार का मतलब है कि कोई दूसरा पहचान पत्र नहीं रखने वाले लोग इसका इस्तेमाल कर सकते हैं लेकिन अनिवार्य आधार इन संबंधों को पलट देता है और सरकारी अधिकारी निर्णायक भूमिका में आ जाते हैं। राजनेताओं ने ही यह हालत पैदा होने दी है क्योंकि मौजूदा सरकार आधार से हासिल काल्पनिक 'बचत' को बेचने की कोशिश में लगी हुई है। विशिष्ट पहचान संख्या जारी करने का मकसद दायरा सीमित करने और पैसे बचाने का नहीं होकर दायरा बढ़ाना और लोगों को बचाना था। नेताओं और नौकरशाहों ने सर्वोच्च न्यायालय के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद आधार के मकसद को बदलकर उसे लचर तरीके से लागू किया और अब इसे अनिवार्य बना रहे हैं। अधिकतर लोग इससे सहमत होंगे कि अगर न्याय ही इकलौता मापदंड है तो पूरी सरकार को अदालती आदेश और भारत की जनता की अवमानना का दोषी माना जा सकता है।
श्री राकेश दुबे वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं।