वाहन उद्योग के लड़खड़ाते पहिये | EDITORIAL by Rakesh Dubey

Bhopal Samachar
देश के उद्योगों में वाहन उद्योग का एक बड़ा योगदान है। देश के नागरिकों की मांग और आपूर्ति करने वाले कारखाने के बीच तालमेल गडबडा रहा है। सही मायने में 70 अरब डॉलर का वाहन उद्योग हिचकोले खा रहा है। आंकड़े कहते हैं मार्च में कारों की बिक्री में 6 प्रतिशत की कमी रही। इस क्षेत्र में पिछली गर्मियों से गिरावट का सिलसिला जारी है। दोपहिया वाहनों की बिक्री भी 15 प्रतिशत कम रही है। यही दशा व्यावसायिक वाहनों की भी है। वाहनों की मांग घटने के कारण कंपनियों को उत्पादन में भी कटौती करनी पड़ी है। वाहन उद्योग में उतार-चढ़ाव का दौर पिछले कुछ सालों से बना हुआ है। कारों की बिक्री में सालाना बढ़त २०१८-१९ में सिर्फ २.७ प्रतिशत की रही है, जो की पांच सालों का सबसे खराब प्रदर्शन है।

अगर दो पहिया वाहन की बात करें दोपहिया वाहनों की बिक्री इस अवधि में ०.२७ प्रतिशत घटी है| ऐसा २००६  के बाद पहली बार हुआ है| यह बात  संतोषजनक है कि व्यावसायिक वाहनों की बिक्री बीते वित्त वर्ष में १७.५५ प्रतिशत अधिक हुई है| जानकारों और उद्योग से जुड़े लोगों का मानना है कि इस सेक्टर में मंदी कुछ समय तक बनी रहेगी| इसका एक संकेत लगभग सभी कंपनियों द्वारा उत्पादन में कटौती के फैसले से मिलता है|आम तौर पर बाजार के लिए वाहनों को ४० से ४५ दिन पहले तैयार कर रखा जाता है, पर अब इसे घटाकर ३०  दिन किया जा रहा है| स्वाभाविक रूप से इसका असर रोजगार पर भी पड़ा है| वर्ष २०१७-१८ में इस क्षेत्र में रोजगार के अवसर २.५ प्रतिशत घटे हैं| वर्ष २०१३-१४ के बाद वाहन उद्योग सेक्टर में नौकरियां कम होने का यह पहला अवसर है|

इस गणित को अगर दर के हिसाब से देखें, तो २०११-१२ के बाद से यह सबसे बड़ी गिरावट है| एक दौर ऐसा भी था, जब भारतीय वाहन बाजार को दुनिया का सबसे तेज गति से बढ़ता बाजार माना जाता था| साल-दर-साल इस सेक्टर में हजारों रोजगार के अवसर पैदा हुआ करते थे| रोजगार में कमी इसलिए भी चिंता का कारण है कि २०१५  और २०१७  के बीच इस उद्योग में नौकरियां बढ़ने की औसत दर ३७ प्रतिशत रही थी|वाहन सेक्टर की स्थिति का सीधा संबंध व्यापक आर्थिकी से है. रोजगार घटने और खर्च बढ़ने के कारण बचत में भी कमी आयी है. ऐसे में लोगों, खासकर युवा ग्राहकों, द्वारा बड़े पैमाने पर वाहनों की खरीद कर पाना मुश्किल है| 

ग्रामीण और कस्बाई इलाकों में कृषि संकट और छोटे कारोबारों के कमजोर होने जैसी विभिन्न वजहों से आमदनी कम होने से हर तरह की मांग पर नकारात्मक असर पड़ा है| उल्लेखनीय है कि वाहन सेक्टर को मजबूत सरकारी संरक्षण प्राप्त है| आयातित वाहनों पर भारी शुल्क के कारण देश में उत्पादित वाहनों को बाहरी कारों, मोटरसाइकिलों और ट्रकों से प्रतिस्पर्धा नहीं मिलती हैं|

लेकिन इसके बावजूद निर्माताओं की कमाई संकुचित हो रही है तथा वे तकनीक और डिजाइन में वांछित निवेश नहीं कर रहे हैं| इस कारण भी ग्राहकों का उत्साह कम होता है| सरकार, उत्पादक, निवेशक और नीति-निर्धारकों को वाहन उद्योग के आसन्न संकट पर गंभीरता से विचार करना होगा, जिससे अर्थव्यवस्था की बढ़त को कायम रखा जा सके|
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श्री राकेश दुबे वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं।
संपर्क  9425022703        
rakeshdubeyrsa@gmail.com
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