MPPSC भर्ती घोटाला, हाई कोर्ट में खुलासा, कोर्ट के बाहर सेटलमेंट, पढ़िए Bhopal Samachar

मध्य प्रदेश लोक सेवा आयोग इंदौर के माध्यम से आयोजित आयुष मेडिकल ऑफिसर चयन परीक्षा के बाद नियुक्ति में घोटाला किया गया है। जब इस गड़बड़ी का खुलासा हाईकोर्ट में हुआ तो मामले को दबाने के लिए आनन-फानन बिना किसी ऑर्डर के, याचिकाकर्ता को नियुक्ति दे दी गई। याचिकाकर्ता ने हाई कोर्ट की मदद से वरिष्ठता का लाभ भी ले लिया परंतु प्रमाणित हो चुके घोटाले में कोई कार्रवाई नहीं हुई, क्योंकि अब कोई व्हिसल ब्लोअर ही नहीं है। 

2022 में नोटिफिकेशन और 2024 में रिजल्ट जारी हुआ था

MPPSC - मध्य प्रदेश लोक सेवा आयोग द्वारा 14/02/22 को आयुर्वेद चिकित्सा अधिकारियों के 692 पद विज्ञापित किए गए थे, जिसमें आयोग द्वारा दिनांक 04/03/2024 को 602 अभ्यर्थियों का रिजल्ट जारी किया गया, जिसमें याचिकाकर्ता सहित समस्त अभ्यर्थियों के अंक भी आयोग द्वारा प्रकाशित किए गए तथा दिनांक 23/10/2024 को मध्य प्रदेश शासन आयुष विभाग द्वारा राज्यपाल के नाम से अभ्यर्थियों को आयुर्वेद चिकित्सा अधिकारी के पद पर नियुक्ति प्रदान कर दी गई। 

अभ्यर्थी के अभ्यावेदन का निराकरण भी नहीं किया

याचिकाकर्ता डॉ. योगराज प्रजापति को नियुक्ति प्रदान नहीं की गई, न ही प्रजापति को लिखित में कोई कारण बताया गया। तब डॉ. योगराज प्रजापति द्वारा ठाकुर लॉ एसोसिएट के माध्यम से हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की गई। याचिका की जनवरी 2025 में प्रारंभिक सुनवाई पर हाईकोर्ट ने राज्य लोक सेवा आयोग सहित कम अंक वाले सभी अभ्यर्थियों को भी नोटिस जारी किए गए। तब आयुष विभाग द्वारा 17/02/25 को डॉ. योगराज/याचिकाकर्ता को नियुक्ति पत्र जारी कर दिया गया। 

याचिकाकर्ता ने वरिष्ठता का लाभ ले लिया

याचिका की अंतिम सुनवाई दिनांक 19/03/25 को चीफ जस्टिस श्री सुरेश कुमार कैत एवं जस्टिस विवेक जैन ने की। याचिकाकर्ता की ओर से कोर्ट को बताया गया कि लोक सेवा आयोग एवं शासन स्तर पर व्यापक पैमाने पर नियम-विरुद्ध नियुक्तियाँ की गई हैं। जो अभ्यर्थी मेरिट में उच्च अंक प्राप्त किए हैं, उन्हें नियुक्ति नहीं दी गई है, जबकि याचिकाकर्ता से कम अंक प्राप्त करने वाले साथी अभ्यर्थियों को नियुक्ति पत्र दिनांक 24 अक्टूबर 2024 में जारी कर दिए गए, तथा याचिकाकर्ता को चार माह विलंब से उक्त याचिका के लंबित रहने के दौरान जारी किया गया है, जिससे याचिकाकर्ता की वरिष्ठता तथा वेतन आदि का नुकसान हुआ है, जबकि याचिकाकर्ता का कोई दोष नहीं है। 

घोटाला प्रमाणित लेकिन केस क्लोज

तब हाईकोर्ट ने याचिका स्वीकार करते हुए राज्य शासन को स्पष्ट रूप से निर्देशित किया कि याचिकाकर्ता को दिनांक 24/10/24 से वरिष्ठता का लाभ प्रदान किया जाए। याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता रामेश्वर सिंह ठाकुर एवं विनायक शाह ने पक्ष रखा। 

पब्लिक पिटीशन 

मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय में दर्ज हुए इस मामले में प्रमाणित हो गया है कि, मध्य प्रदेश लोक सेवा आयोग इंदौर के माध्यम से आयोजित हुई परीक्षा के बाद नियुक्ति प्रक्रिया में गड़बड़ी की गई थी। इस मामले में ने जब अभ्यर्थी के अभ्यावेदन का निराकरण नहीं किया गया तो एमपीपीएससी अथवा नियुक्तिकर्ता विभाग को हाई कोर्ट में अपना पक्ष रखना चाहिए था। उसने ऐसा नहीं किया। कोर्ट रूम के बाहर सेटलमेंट करते हुए याचिकाकर्ता को नियुक्ति दे दी। सवाल यह है कि क्या एमपीपीएससी अथवा नियुक्तिकर्ता विभाग को इस प्रकार कोर्ट रूम के बाहर सेटलमेंट करने का अधिकार है। 

मेरिट लिस्ट जारी होने के बाद नियुक्ति पत्र जारी नहीं होना एक गलती मानी जा सकती है परंतु अभ्यावेदन का निराकरण नहीं करना, गलती नहीं है। ऐसी स्थिति में मामला कोर्ट रूम के भीतर डिसाइड होना चाहिए था। सवाल यह है कि क्या, हर उम्मीदवार, जो अन्याय से पीड़ित हुआ है, उसे अपनी नियुक्ति के लिए हाई कोर्ट आना होगा। यदि किसी उम्मीदवार को पता ही ना चले कि, उसके साथ अन्याय हो गया है तो फिर उसको न्याय कैसे मिलेगा। क्या सिस्टम को ठीक करने की जरूरत नहीं है। क्या सिस्टम में बैठकर गड़बड़ी करने वाले को बाहर निकालने और जेल की सलाखों के पीछे पहुंचाने की जरूरत नहीं है। 

न्यायालय की अपनी मर्यादा और सीमाएं होती है। न्यायालय विसलब्लोअर नहीं हो सकता है लेकिन इस तरह के मामलों से निपटने के लिए सरकार के पास असीमित शक्ति होती है। क्या सरकार इस प्रकार की व्यवस्था का शुद्धिकरण करेगी।

MPPSC का पक्ष

मध्य प्रदेश लोक सेवा आयोग इंदौर की ओर से  OSD रविंदर पंचभाई ने भोपाल समाचार को बताया कि, इस पूरी प्रक्रिया में एमपीपीएससी की कोई भूमिका नहीं है। एमपीपीएससी ने परीक्षा का आयोजन करके मेरिट लिस्ट आयुष विभाग को भेज दी थी। सिलेक्शन लिस्ट डिपार्टमेंट की ओर से तैयार की गई थी।

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