भोपाल के सरकारी शिक्षकों की पॉलिटिक्स में नाबालिग छात्राओं से नारेबाजी करवाई, क्या कोई संज्ञान लेगा

Updesh Awasthee
भोपाल, 23 अक्टूबर 2026
: मध्य प्रदेश के स्कूल शिक्षा विभाग में पॉलिटिक्स का लेवल हाई हो चुका है। सरकारी शिक्षकों की आपसी पॉलिटिक्स में विद्यार्थियों को घसीटा जाने लगा है। मिसरोद स्थित शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय में 5 अक्टूबर को उपद्रव किया गया था। कोई कानूनी कार्रवाई नहीं हुई, पेरेंट्स को तलब करके पाबंदी का बंदोबस्त भी नहीं किया गया। नतीजा आज फिर 18 वर्ष से कम आयु की छात्राओं से नारेबाजी करवाई गई। मुद्दा यह नहीं है कि महिला शिक्षक सही है या गलत, मुद्दा यह है कि स्कूल में पढ़ने आए बच्चों से नारेबाजी क्यों करवाई जा रही है। सवाल यह है कि क्या मानवाधिकार आयोग अथवा बाल आयोग इस मामले का संज्ञान लेगा? 

मामला मैनेजमेंट का लेकिन टारगेट पर महिला शिक्षक: विद्यार्थियों के आरोप

  • पढ़ाई के बजाय सफाई और दूसरे काम कराए जाते हैं, विरोध करने पर फेल करने की धमकी दी जाती है और मारपीट भी की जाती है। 
  • महिला शिक्षक पर छात्राओं को लेकर आपत्तिजनक टिप्पणी करने के आरोप। 
  • परीक्षा और अन्य गतिविधियों के दौरान उनसे बेंच जमाने, सफाई कराने और रोल नंबर लिखने जैसे काम कराए जाते हैं। 
  • लैब की सफाई का काम भी विद्यार्थियों से करवाया जाता है। 
  • काम करने से मना करने पर उन्हें फेल करने की धमकी दी जाती है। 
  • रविवार को परीक्षा के लिए बुलाया गया।
  • जूनियर छात्रों ने बताया कि उनके सामने सीनियर छात्रों की लोहे के पाइप से पिटाई की गई। 
  • कुछ छात्राओं ने भी हाथ-पैर में पाइप से मारने का आरोप लगाया। 
  • एक छात्रा ने दावा किया कि सवाल का जवाब देर से देने पर उसके साथ भी मारपीट की गई। 
  • विज्ञान विषय लेने वाले छात्रों से प्रोजेक्ट के नाम पर हर महीने 2500 रुपये मांगने का आरोप। 
छात्रों ने अपनी शिकायत के साथ एक ऑडियो रिकॉर्डिंग भी दी है जिसमें, परीक्षा परिणाम, पास-फेल और पैसे खर्च होने जैसी बातें हैं। 

दो आरोप बड़े अजीब से हैं
इसके अलावा दो आरोप बड़े अजीब से हैं। छात्राओं ने महिला शिक्षक पर आपत्तिजनक टिप्पणी का आरोप लगाया है। यहां नोट करना जरूरी है कि, शिक्षक पुरुष नहीं बल्कि महिला है। दूसरा- जूनियर छात्रों ने सीनियर छात्रों को प्रताड़ित किए जाने का मामला उठाया है। सामान्य तौर पर सीनियर छात्र, जूनियर छात्रों के अधिकारों की रक्षा करते हैं। यहां उल्टा हुआ है। 

जिला शिक्षा अधिकारी ने तत्काल कार्रवाई की थी 

5 अक्टूबर को जब प्रदर्शन हुआ तो भोपाल के जिला शिक्षा अधिकारी ने तत्काल कार्रवाई करते हुए, महिला शिक्षक बबिता कुशवाहा को मिसरोद स्कूल से हटा दिया था। जबकि स्कूल में तोड़फोड़ करने वाले, और सीसीटीवी कैमरा तोड़ने वालों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की गई। इसका नतीजा यह हुआ कि, 5 अक्टूबर वाले प्रोटेस्ट के पीछे पॉलिटिक्स करने वालों के हौसले बढ़ गए थे। 

आज क्या हुआ: विद्यार्थी अब क्या चाहते हैं

आज शुक्रवार 23 अक्टूबर को स्कूल में एक बार फिर विरोध प्रदर्शन हुआ। शिक्षा का मंदिर पॉलिटिकल बैटलफील्ड बन गई। एक बार फिर 18 वर्ष से कम आयु की छात्राओं से नारेबाजी करवाई गई। महिला शिक्षक बबीता कुशवाहा को सस्पेंड करने की मांग की जा रही है। हालांकि निलंबन कोई सजा नहीं होती, लेकिन किसी कर्मचारी को निलंबित किए जाने का समाचार, उसको बदनाम करने के लिए काफी होता है। 

जिला शिक्षा अधिकारी को क्या करना चाहिए था

यदि जिला शिक्षा अधिकारी दोनों पक्षों की जांच करते। प्रदर्शन करने वाले विद्यार्थियों के पेरेंट्स को बुलाकर लिखित में पाबंद किया जाता। पेरेंट्स की अनुमति के बिना छात्राओं का पॉलिटिकल यूज करने वाले के खिलाफ नोटिस जारी किया जाता तो शायद अनुशासन की स्थिति बनी रहती, लेकिन शायद जिला शिक्षा अधिकारी के पद पर बैठा हुआ अधिकारी भी जुगाड़ की पोस्टिंग में है।
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